महाबलीपुरम के पास बसा एक मछुआरों का गांव

शाम हो रही थी, मेरे कमरे से सूर्यास्त दिख रहा था| नीचे मेरे गेस्ट हाउस का मालिक और उसके साथी अपनी मछली पकड़ने के जाल की मरम्मत करने में लगे हुए थे| कुछ बच्चे खेल रहे थे और अँगरेज़ अपने सितार, गिटार ले कर रियाज़ फर्मा रहे थे|

खीरगंगा: भूली भटकी यात्रा

कुछ 40 मिनट के बाद मै बरशैणी पहुचता हूँ, शाम हो चूकी है, लग रहा हैं जैसे बारिश होगी। मुझे अभी कल्गा तक जाना है, जहाँ से मेरा कल का ट्रेक शुरू होगा। चलते चलते बूंदे टपकने लगती है, आसमान काला होने लगता है, थोड़ी दूर पर बर्फ से ढंकी पिन पार्वती घाटी की चोटियाँ मुझे आवाज़ देती है, नीचे पार्वती नदी की धाराए अपना अलग ही राग गाती है।

Blog at WordPress.com.

Up ↑