Concept of दर्द-ए-जुदाई

दिल्ली से पटना ट्रेन से आ रहे थे तो साथ वाली सीट पर एक लड़का फ़ोन पर अपनी गर्लफ्रेंड से लगा हुआ था। कोई बात पर दोनों में लड़ाई हो रही थी। लड़का कभी गुस्साता कभी सेन्टियता कभी रोने कि एक्टिंग करता लेकिन लड़की भी तेज़ लग रही थी, नहीं मानी तो नहीं मानी। लड़का भी थक हार कर कम्बल ओढ़ कर लेट गया लेकिन फिर उस से रहा नहीं गया तो वापिस कॉल लगा कर रोने लगा। हमारे पास करने के लिए कुछ था नहीं तो ऑब्जरवेशन इसी में लगा दिए। इसको देख देख कर एक तरफ हसी भी आ रही थी तो दूसरी तरफ पकड़ कर थूर देने का भी दिल कर रहा था। अब बात जो भी हो, एक बात तो पुरे पर्सनल एक्सपीरियंस के साथ बोल सकते हैं कि पक्का पहली गर्लफ्रेंड रही होगी। जो स्टेज में लड़का को इतना कॉन्फिडेंस रहता नहीं कि अगर उसकी गर्लफ्रेंड किसी और लौंडे से बतिया तो उसको ऐसा लगता है कि 50% ब्रेकअप तो हो ही गया। हमारा भी कभी यही हाल था ये बात हम बड़ी बेशर्मी के साथ क़ुबूल कर सकते है।

खैर, जो भी हो। पर्सनल एक्सपीरियंस पे जाए तो एक बात हम गौर किये है कि सेलफोन के आने के बाद से कपल सब में झगड़ा झंझट ज्यादा हो गया है। पहले फ़ोन नहीं था तो कपल लोग एक दूसरे को लव लैटर लिखा करते थे। हम अपने टाइम में नोटबुक के अंदर लव लैटर डाल कर खूब एक्सचेंज किये है। नोटबुक एक्सचेंज करने का तरीका भी ऐसा कि वही नोटबुक दो बार लड़की के घर नहीं जा सकता था। एक नोटबुक शालू कुमारी के नाम से होता था और दूसरा नेहा मिश्रा का। और तो और नकली नोट्स भी बनाने पड़ते थे दोनों नोटबुक्स में, इसी बहाने एग्जाम में नंबर भी ज्यादा आ जाते थे। तो लव लैटर के ज़माने में झगड़ा कैसे पॉसिबल हो सकता था। डायरेक्ट बात चीत तो केवल ट्यूशन में ही थोडा बहुत हो पाता था वो भी इस शर्त पर कि अगर लड़का उस जगह ट्यूशन पढ़ने जाए जहाँ उसकी गर्लफ्रेंड पढ़ती है। लड़की ट्यूशन मास्टर नहीं बदलती थी। अब हफ्ता में एक बात 5 मिनट के लिए बात और दो बार लैटर एक्सचेंज में कोई कितना लड़ सकता है? ज्यादा से ज्यादा लड़की ने किसी दिन अपने बॉयफ्रेंड को किसी और लड़की से बात करते हुए देख लिया तो इतना लिख देती थी कि “हम तुमको देखे ऊ मुझौसी से बात करते हुए, हमको पसंद नहीं आया। अगला बार देखे तो चिट्ठी नहीं लिखेंगे पूरा एक हफ्ता।” लड़का भी क्या करेगा जवाब में लिख देता था कि आगे से नहीं होगा और मैटर ख़तम। आजकल का कपल से छोटा छोटा बात पर इतना बड़ा हल्ला हंगामा मचाता है कि पूछो मत।

पहले दूरी होती थी, लोग 3-4 दिन बिना बात किये ऐसे पगला जाते थे कि नेक्स्ट टाइम कि बात मुलाकात कि लिए लड़ने झगड़ने के लिए टाइम कहाँ बचता था। लड़की भी छुप छुपा कर मंदिर मिलने आती थी वहाँ पर झगड़ा करके किसको सीन क्रिएट करना था। बात कम होती थी तो लड़ाई कम होती थी, अब 24 घंटा फ़ोन पर चिपके रहने वाले लोगो के पास कोई टॉपिक बचेगा नहीं तो लड़ेंगे ही ना। हमारा टाइम तो फिर भी नजरअंदाज़ कर सकते हैं। आज से 25-30 साल पहले जब पति अपनी पत्नी से दूर रह कर काम करता था तो 15 दिन में एक बार चिट्ठी एक्सचेंज होती थी। डाकिया भी तब VIP से कम नहीं होता था, साला लाट साहेब के तरह आता था। 15 दिन चिट्ठी का इंतज़ार होता था और फिर एक इनलैंड पोस्ट पर जवाब लिखा जाता था। जवाब भी ऐसा कि सारा जुदाई का दर्द उसी चिट्ठी में सिमट कर आ जाए, तब लड़ने के लिए टाइम किसके पास होता था। हाँ कभी कभी बीवी लिख देती थी कि “सासु माँ बहुत खट्वा रही है” तो पतिदेव भी दिलासे में बोल देते थे कि जल्द आ कर ले जाएंगे।

अब तो दो लोग कितना भी दूर रहे मोबाइल फ़ोन कि कृपा से पास पास ही रहते है और बात बेबात आपस में झगड़ लेते है। इन लोगो को क्या पता कि थोड़े टाइम दूर रहने के बाद, बिना बात चित किये बिना रहना और उसके बात 10-15 दिन बाद एक दूसरे कि शकल देखना कैसा लगता है। अब तो दो दिन बात न हो तो तीसरे दिन दोनों को लगता है कि कहीं उसको छोड़ कही दूसरा तो नहीं न मिल गया हो। फिर ऐसे ही रात बात बात झगड़ना रोना और सेंटी देना चलता रहता है जैसे कभी हम किया करते थे और जैसे मेरे साथ कि सीट पे बैठा ये लौंडा आज कर रहा है।

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